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रोमियों 1:27 - सत्यवेदः। Sanskrit NT in Devanagari

27 तथा पुरुषा अपि स्वाभाविकयोषित्सङ्गमं विहाय परस्परं कामकृशानुना दग्धाः सन्तः पुमांसः पुंभिः साकं कुकृत्ये समासज्य निजनिजभ्रान्तेः समुचितं फलम् अलभन्त।

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि


अधिकानि संस्करणानि

সত্যৱেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Assamese Script

27 তথা পুৰুষা অপি স্ৱাভাৱিকযোষিৎসঙ্গমং ৱিহায পৰস্পৰং কামকৃশানুনা দগ্ধাঃ সন্তঃ পুমাংসঃ পুংভিঃ সাকং কুকৃত্যে সমাসজ্য নিজনিজভ্ৰান্তেঃ সমুচিতং ফলম্ অলভন্ত|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

সত্যবেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Bengali Script

27 তথা পুরুষা অপি স্ৱাভাৱিকযোষিৎসঙ্গমং ৱিহায পরস্পরং কামকৃশানুনা দগ্ধাঃ সন্তঃ পুমাংসঃ পুংভিঃ সাকং কুকৃত্যে সমাসজ্য নিজনিজভ্রান্তেঃ সমুচিতং ফলম্ অলভন্ত|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

သတျဝေဒး၊ Sanskrit Bible (NT) in Burmese Script

27 တထာ ပုရုၐာ အပိ သွာဘာဝိကယောၐိတ္သင်္ဂမံ ဝိဟာယ ပရသ္ပရံ ကာမကၖၑာနုနာ ဒဂ္ဓား သန္တး ပုမာံသး ပုံဘိး သာကံ ကုကၖတျေ သမာသဇျ နိဇနိဇဘြာန္တေး သမုစိတံ ဖလမ် အလဘန္တ၊

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavEdaH| Sanskrit Bible (NT) in Cologne Script

27 tathA puruSA api svAbhAvikayOSitsaggamaM vihAya parasparaM kAmakRzAnunA dagdhAH santaH pumAMsaH puMbhiH sAkaM kukRtyE samAsajya nijanijabhrAntEH samucitaM phalam alabhanta|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

સત્યવેદઃ। Sanskrit Bible (NT) in Gujarati Script

27 તથા પુરુષા અપિ સ્વાભાવિકયોષિત્સઙ્ગમં વિહાય પરસ્પરં કામકૃશાનુના દગ્ધાઃ સન્તઃ પુમાંસઃ પુંભિઃ સાકં કુકૃત્યે સમાસજ્ય નિજનિજભ્રાન્તેઃ સમુચિતં ફલમ્ અલભન્ત|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavedaH| Sanskrit Bible (NT) in Harvard-Kyoto Script

27 tathA puruSA api svAbhAvikayoSitsaGgamaM vihAya parasparaM kAmakRzAnunA dagdhAH santaH pumAMsaH puMbhiH sAkaM kukRtye samAsajya nijanijabhrAnteH samucitaM phalam alabhanta|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि




रोमियों 1:27
5 अन्तरसन्दर्भाः  

ईश्वरस्य राज्येऽन्यायकारिणां लोकानामधिकारो नास्त्येतद् यूयं किं न जानीथ? मा वञ्च्यध्वं, ये व्यभिचारिणो देवार्च्चिनः पारदारिकाः स्त्रीवदाचारिणः पुंमैथुनकारिणस्तस्करा


अपरं सिदोमम् अमोरा तन्निकटस्थनगराणि चैतेषां निवासिनस्तत्समरूपं व्यभिचारं कृतवन्तो विषममैथुनस्य चेष्टया विपथं गतवन्तश्च तस्मात् तान्यपि दृष्टान्तस्वरूपाणि भूत्वा सदातनवह्निना दण्डं भुञ्जते।


अस्मान् अनुसरणं कुर्वन्तु : १.

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