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लूका 15:4 - सत्यवेदः। Sanskrit NT in Devanagari

4 कस्यचित् शतमेषेषु तिष्ठत्मु तेषामेकं स यदि हारयति तर्हि मध्येप्रान्तरम् एकोनशतमेषान् विहाय हारितमेषस्य उद्देशप्राप्तिपर्य्यनतं न गवेषयति, एतादृशो लोको युष्माकं मध्ये क आस्ते?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि


अधिकानि संस्करणानि

সত্যৱেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Assamese Script

4 কস্যচিৎ শতমেষেষু তিষ্ঠত্মু তেষামেকং স যদি হাৰযতি তৰ্হি মধ্যেপ্ৰান্তৰম্ একোনশতমেষান্ ৱিহায হাৰিতমেষস্য উদ্দেশপ্ৰাপ্তিপৰ্য্যনতং ন গৱেষযতি, এতাদৃশো লোকো যুষ্মাকং মধ্যে ক আস্তে?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

সত্যবেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Bengali Script

4 কস্যচিৎ শতমেষেষু তিষ্ঠত্মু তেষামেকং স যদি হারযতি তর্হি মধ্যেপ্রান্তরম্ একোনশতমেষান্ ৱিহায হারিতমেষস্য উদ্দেশপ্রাপ্তিপর্য্যনতং ন গৱেষযতি, এতাদৃশো লোকো যুষ্মাকং মধ্যে ক আস্তে?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

သတျဝေဒး၊ Sanskrit Bible (NT) in Burmese Script

4 ကသျစိတ် ၑတမေၐေၐု တိၐ္ဌတ္မု တေၐာမေကံ သ ယဒိ ဟာရယတိ တရှိ မဓျေပြာန္တရမ် ဧကောနၑတမေၐာန် ဝိဟာယ ဟာရိတမေၐသျ ဥဒ္ဒေၑပြာပ္တိပရျျနတံ န ဂဝေၐယတိ, ဧတာဒၖၑော လောကော ယုၐ္မာကံ မဓျေ က အာသ္တေ?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavEdaH| Sanskrit Bible (NT) in Cologne Script

4 kasyacit zatamESESu tiSThatmu tESAmEkaM sa yadi hArayati tarhi madhyEprAntaram EkOnazatamESAn vihAya hAritamESasya uddEzaprAptiparyyanataM na gavESayati, EtAdRzO lOkO yuSmAkaM madhyE ka AstE?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

સત્યવેદઃ। Sanskrit Bible (NT) in Gujarati Script

4 કસ્યચિત્ શતમેષેષુ તિષ્ઠત્મુ તેષામેકં સ યદિ હારયતિ તર્હિ મધ્યેપ્રાન્તરમ્ એકોનશતમેષાન્ વિહાય હારિતમેષસ્ય ઉદ્દેશપ્રાપ્તિપર્ય્યનતં ન ગવેષયતિ, એતાદૃશો લોકો યુષ્માકં મધ્યે ક આસ્તે?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavedaH| Sanskrit Bible (NT) in Harvard-Kyoto Script

4 kasyacit zatameSeSu tiSThatmu teSAmekaM sa yadi hArayati tarhi madhyeprAntaram ekonazatameSAn vihAya hAritameSasya uddezaprAptiparyyanataM na gaveSayati, etAdRzo loko yuSmAkaM madhye ka Aste?

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि




लूका 15:4
19 अन्तरसन्दर्भाः  

तेन स प्रत्युवाच, विश्रामवारे यदि कस्यचिद् अवि र्गर्त्ते पतति, तर्हि यस्तं घृत्वा न तोलयति, एतादृशो मनुजो युष्माकं मध्ये क आस्ते?


तदा पभुः प्रत्युवाच रे कपटिनो युष्माकम् एकैको जनो विश्रामवारे स्वीयं स्वीयं वृषभं गर्दभं वा बन्धनान्मोचयित्वा जलं पाययितुं किं न नयति?


तदा स तेभ्य इमां दृष्टान्तकथां कथितवान्,


यद् हारितं तत् मृगयितुं रक्षितुञ्च मनुष्यपुत्र आगतवान्।


हे परदूषक मनुष्य यः कश्चन त्वं भवसि तवोत्तरदानाय पन्था नास्ति यतो यस्मात् कर्म्मणः परस्त्वया दूष्यते तस्मात् त्वमपि दूष्यसे, यतस्तं दूषयन्नपि त्वं तद्वद् आचरसि।


यतः पूर्व्वं यूयं भ्रमणकारिमेषा इवाध्वं किन्त्वधुना युष्माकम् आत्मनां पालकस्याध्यक्षस्य च समीपं प्रत्यावर्त्तिताः।


अस्मान् अनुसरणं कुर्वन्तु : १.

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