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योहन 20:15 - सत्यवेदः। Sanskrit NT in Devanagari

15 तदा यीशुस्ताम् अपृच्छत् हे नारि कुतो रोदिषि? कं वा मृगयसे? ततः सा तम् उद्यानसेवकं ज्ञात्वा व्याहरत्, हे महेच्छ त्वं यदीतः स्थानात् तं नीतवान् तर्हि कुत्रास्थापयस्तद् वद तत्स्थानात् तम् आनयामि।

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि


अधिकानि संस्करणानि

সত্যৱেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Assamese Script

15 তদা যীশুস্তাম্ অপৃচ্ছৎ হে নাৰি কুতো ৰোদিষি? কং ৱা মৃগযসে? ততঃ সা তম্ উদ্যানসেৱকং জ্ঞাৎৱা ৱ্যাহৰৎ, হে মহেচ্ছ ৎৱং যদীতঃ স্থানাৎ তং নীতৱান্ তৰ্হি কুত্ৰাস্থাপযস্তদ্ ৱদ তৎস্থানাৎ তম্ আনযামি|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

সত্যবেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Bengali Script

15 তদা যীশুস্তাম্ অপৃচ্ছৎ হে নারি কুতো রোদিষি? কং ৱা মৃগযসে? ততঃ সা তম্ উদ্যানসেৱকং জ্ঞাৎৱা ৱ্যাহরৎ, হে মহেচ্ছ ৎৱং যদীতঃ স্থানাৎ তং নীতৱান্ তর্হি কুত্রাস্থাপযস্তদ্ ৱদ তৎস্থানাৎ তম্ আনযামি|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

သတျဝေဒး၊ Sanskrit Bible (NT) in Burmese Script

15 တဒါ ယီၑုသ္တာမ် အပၖစ္ဆတ် ဟေ နာရိ ကုတော ရောဒိၐိ? ကံ ဝါ မၖဂယသေ? တတး သာ တမ် ဥဒျာနသေဝကံ ဇ္ဉာတွာ ဝျာဟရတ်, ဟေ မဟေစ္ဆ တွံ ယဒီတး သ္ထာနာတ် တံ နီတဝါန် တရှိ ကုတြာသ္ထာပယသ္တဒ် ဝဒ တတ္သ္ထာနာတ် တမ် အာနယာမိ၊

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavEdaH| Sanskrit Bible (NT) in Cologne Script

15 tadA yIzustAm apRcchat hE nAri kutO rOdiSi? kaM vA mRgayasE? tataH sA tam udyAnasEvakaM jnjAtvA vyAharat, hE mahEccha tvaM yadItaH sthAnAt taM nItavAn tarhi kutrAsthApayastad vada tatsthAnAt tam AnayAmi|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

સત્યવેદઃ। Sanskrit Bible (NT) in Gujarati Script

15 તદા યીશુસ્તામ્ અપૃચ્છત્ હે નારિ કુતો રોદિષિ? કં વા મૃગયસે? તતઃ સા તમ્ ઉદ્યાનસેવકં જ્ઞાત્વા વ્યાહરત્, હે મહેચ્છ ત્વં યદીતઃ સ્થાનાત્ તં નીતવાન્ તર્હિ કુત્રાસ્થાપયસ્તદ્ વદ તત્સ્થાનાત્ તમ્ આનયામિ|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavedaH| Sanskrit Bible (NT) in Harvard-Kyoto Script

15 tadA yIzustAm apRcchat he nAri kuto rodiSi? kaM vA mRgayase? tataH sA tam udyAnasevakaM jJAtvA vyAharat, he maheccha tvaM yadItaH sthAnAt taM nItavAn tarhi kutrAsthApayastad vada tatsthAnAt tam AnayAmi|

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि




योहन 20:15
12 अन्तरसन्दर्भाः  

रे भुजगवंशा यूयमसाधवः सन्तः कथं साधु वाक्यं वक्तुं शक्ष्यथ? यस्माद् अन्तःकरणस्य पूर्णभावानुसाराद् वदनाद् वचो निर्गच्छति।


स दूतो योषितो जगाद, यूयं मा भैष्ट, क्रुशहतयीशुं मृगयध्वे तदहं वेद्मि।


सोऽवदत्, माभैष्ट यूयं क्रुशे हतं नासरतीययीशुं गवेषयथ सोत्र नास्ति श्मशानादुदस्थात्; तै र्यत्र स स्थापितः स्थानं तदिदं पश्यत।


स सङ्गिभिः सह विद्यत एतच्च बुद्व्वा दिनैकगम्यमार्गं जग्मतुः। किन्तु शेषे ज्ञातिबन्धूनां समीपे मृगयित्वा तदुद्देेशमप्राप्य


तस्मात्ताः शङ्कायुक्ता भूमावधोमुख्यस्यस्थुः। तदा तौ ता ऊचतु र्मृतानां मध्ये जीवन्तं कुतो मृगयथ?


ततो यीशुः परावृत्य तौ पश्चाद् आगच्छन्तौ दृष्ट्वा पृष्टवान् युवां किं गवेशयथः? तावपृच्छतां हे रब्बि अर्थात् हे गुरो भवान् कुत्र तिष्ठति?


स्वं प्रति यद् घटिष्यते तज् ज्ञात्वा यीशुरग्रेसरः सन् तानपृच्छत् कं गवेषयथ?


ततो यीशुः पुनरपि पृष्ठवान् कं गवेषयथ? ततस्ते प्रत्यवदन् नासरतीयं यीशुं।


तौ पृष्टवन्तौ हे नारि कुतो रोदिषि? सावदत् लोका मम प्रभुं नीत्वा कुत्रास्थापयन् इति न जानामि।


अस्मान् अनुसरणं कुर्वन्तु : १.

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