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रोमियों 1:29 - सत्यवेदः। Sanskrit NT in Devanagari

29 अतएव ते सर्व्वे ऽन्यायो व्यभिचारो दुष्टत्वं लोभो जिघांसा ईर्ष्या वधो विवादश्चातुरी कुमतिरित्यादिभि र्दुष्कर्म्मभिः परिपूर्णाः सन्तः

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि


अधिकानि संस्करणानि

সত্যৱেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Assamese Script

29 অতএৱ তে সৰ্ৱ্ৱে ঽন্যাযো ৱ্যভিচাৰো দুষ্টৎৱং লোভো জিঘাংসা ঈৰ্ষ্যা ৱধো ৱিৱাদশ্চাতুৰী কুমতিৰিত্যাদিভি ৰ্দুষ্কৰ্ম্মভিঃ পৰিপূৰ্ণাঃ সন্তঃ

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

সত্যবেদঃ। Sanskrit Bible (NT) in Bengali Script

29 অতএৱ তে সর্ৱ্ৱে ঽন্যাযো ৱ্যভিচারো দুষ্টৎৱং লোভো জিঘাংসা ঈর্ষ্যা ৱধো ৱিৱাদশ্চাতুরী কুমতিরিত্যাদিভি র্দুষ্কর্ম্মভিঃ পরিপূর্ণাঃ সন্তঃ

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

သတျဝေဒး၊ Sanskrit Bible (NT) in Burmese Script

29 အတဧဝ တေ သရွွေ 'နျာယော ဝျဘိစာရော ဒုၐ္ဋတွံ လောဘော ဇိဃာံသာ ဤရ္ၐျာ ဝဓော ဝိဝါဒၑ္စာတုရီ ကုမတိရိတျာဒိဘိ ရ္ဒုၐ္ကရ္မ္မဘိး ပရိပူရ္ဏား သန္တး

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavEdaH| Sanskrit Bible (NT) in Cologne Script

29 ataEva tE sarvvE 'nyAyO vyabhicArO duSTatvaM lObhO jighAMsA IrSyA vadhO vivAdazcAturI kumatirityAdibhi rduSkarmmabhiH paripUrNAH santaH

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

સત્યવેદઃ। Sanskrit Bible (NT) in Gujarati Script

29 અતએવ તે સર્વ્વે ઽન્યાયો વ્યભિચારો દુષ્ટત્વં લોભો જિઘાંસા ઈર્ષ્યા વધો વિવાદશ્ચાતુરી કુમતિરિત્યાદિભિ ર્દુષ્કર્મ્મભિઃ પરિપૂર્ણાઃ સન્તઃ

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि

satyavedaH| Sanskrit Bible (NT) in Harvard-Kyoto Script

29 ataeva te sarvve 'nyAyo vyabhicAro duSTatvaM lobho jighAMsA IrSyA vadho vivAdazcAturI kumatirityAdibhi rduSkarmmabhiH paripUrNAH santaH

अध्यायं द्रष्टव्यम् प्रतिलिपि




रोमियों 1:29
8 अन्तरसन्दर्भाः  

किन्त्वहं युष्मान् व्याहरामि, व्यभिचारदोषे न जाते यदि कश्चिन् निजजायां परित्यजति, तर्हि स तां व्यभिचारयति; यश्च तां त्यक्तां स्त्रियं विवहति, सोपि व्यभिचरति।


लिपि र्यथास्ते, नैकोपि धार्म्मिको जनः।


अहं यदागमिष्यामि, तदा युष्मान् यादृशान् द्रष्टुं नेच्छामि तादृशान् द्रक्ष्यामि, यूयमपि मां यादृशं द्रष्टुं नेच्छथ तादृशं द्रक्ष्यथ, युष्मन्मध्ये विवाद ईर्ष्या क्रोधो विपक्षता परापवादः कर्णेजपनं दर्पः कलहश्चैते भविष्यन्ति;


अपरं योषिद्भिरपि विनीताभिरनपवादिकाभिः सतर्काभिः सर्व्वत्र विश्वास्याभिश्च भवितव्यं।


यतः पूर्व्वं वयमपि निर्ब्बोधा अनाज्ञाग्राहिणो भ्रान्ता नानाभिलाषाणां सुखानाञ्च दासेया दुष्टत्वेर्ष्याचारिणो घृणिताः परस्परं द्वेषिणश्चाभवामः।


अस्मान् अनुसरणं कुर्वन्तु : १.

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