2 कुरि 10:2 - इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) उर्दू - 20192 बल्कि मिन्नत करता हूँ कि मुझे हाज़िर होकर उस बेबाकी के साथ दिलेर न होना पड़े जिससे मैं कुछ लोगों पर दिलेर होने का क़स्द रखता हूँ जो हमें यूँ समझते हैं कि हम जिस्म के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारते हैं। See the chapterउर्दू हमअस्र तरजुमा2 बल्के मिन्नत करता हूं के मुझे मजबूर न करो के वहां आकर सख़्ती से काम लूं जो हम पर यह इल्ज़ाम लगाते हैं के हम महज़ दुनियवी जिस्मानी ख़ाहिशात की तक्मील के लिये ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं। See the chapterकिताब-ए मुक़द्दस2 मैं आपसे मिन्नत करता हूँ कि मुझे आपके पास आकर इतनी दिलेरी से उन लोगों से निपटना न पड़े जो समझते हैं कि हमारा चाल-चलन दुनियावी है। क्योंकि फ़िलहाल ऐसा लगता है कि इसकी ज़रूरत होगी। See the chapter |