13 तां बगीचेरै मालिकै तैन्हांं मझांं ऐकिनि जुबाव दिता कि, हे मित्र! आंउ ताउ सिंउ कौ अन्याय काता! क्या मीं तुहांनि अक धियाड़ी कम कांनेरी त्योतियै धियाड़ी ना दित्ती ज्योति शुणाउरी थी।