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1 कुरि 7:36 - इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) उर्दू - 2019

36 अगर कोई ये समझे कि मैं अपनी उस कुँवारी लड़की की हक़तल्फ़ी करता हूँ जिसकी जवानी ढल चली है और ज़रूरत भी मा'लूम हो तो इख़्तियार है इस में गुनाह नहीं वो उसकी शादी होने दे।

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उर्दू हमअस्र तरजुमा

36 अगर कोई ये समझता है के मैं अपनी मंगनी शुदा कुंवारी का हक़ मार रहा हूं, कुंवारी लड़की की जवानी ढली जा रही है और ज़रूरी है के उसे शादी करनी चाहिये तो जैसा चाहे वैसा करे उसे इख़्तियार है के लड़की का ब्याह हो जाने दे क्यूंके ये कोई गुनाह नहीं।

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किताब-ए मुक़द्दस

36 अगर कोई समझता है, ‘मैं अपनी कुँवारी मंगेतर से शादी न करने से उसका हक़ मार रहा हूँ’ या यह कि ‘मेरी उसके लिए ख़ाहिश हद से ज़्यादा है, इसलिए शादी होनी चाहिए’ तो फिर वह अपने इरादे को पूरा करे, यह गुनाह नहीं। वह शादी कर ले।

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1 कुरि 7:36

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