16 एकरसेति ओह अपन जाल बर बलि चघाथे, अऊ अपन मछरी के जाल के आघू म धूप जलाथे, काबरकि अपन जाल के कारन ही ओह अराम के जिनगी जीथे अऊ मनपसंद भोजन के मजा लेथे।