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1 कुरि 9:17 - किताब-ए मुक़द्दस

17 अगर मैं यह अपनी मरज़ी से करता तो फिर अज्र का मेरा हक़ बनता। लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि ख़ुदा ही ने मुझे यह ज़िम्मादारी दी है।

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इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) उर्दू - 2019

17 क्यूँकि अगर अपनी मर्ज़ी से ये करता हूँ तो मेरे लिए अज्र है और अगर अपनी मर्ज़ी से नहीं करता तो मुख़्तारी मेरे सुपुर्द हुई है।

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उर्दू हमअस्र तरजुमा

17 अगर मैं अपनी मर्ज़ी से मुनादी करता हूं, तो अज्र पाने की उम्मीद भी रखता हूं; लेकिन अगर अपनी मर्ज़ी से नहीं, तो यूं समझ लो के ख़ुदा ने मुझे इन्जील सुनाने का इख़्तियार बख़्शा हुआ है।

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1 कुरि 9:17

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